रस्म-ए-निस्बत

तुम्हारे जिस्म,जेवर कि तारीफ़ अब नही करुगा क्योकि यह कहने का हक ओ हुकूमत सिर्फ तुम्हारे ख़ाविंद को है।

बचपन कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला,इसकी खबर जरूर थी कि तुम हो पर तुम  पर कभी गौर नहीं फरमाया, याद ही नहीं तुम्हें कभी मकतब जाते देखा हो पर यह करीब कुछ ही साल हुए हैं जिसमें मुझ पर तुम्हारा खुमार चढ़ा है। कोई इतना समीप इतने लंबे वक्त गुजारने के बाद भी नहीं आया जितनी रिश्तेदारी तुम एक अजनबी से कुछ ही पल में बना बैठे। तुम ज़हीन हो, तुमने जो किया जब किया सही वक्त पर किया यही शायद सही उम्र है नया घर बसाने की, मैं तो कर ही रहा हूं पर तुम मेरे पीछे बाल सफेद नहीं कर सकती, पर देखो यह तुम्हारी जरूरत से ज्यादा समझदारी ने ही मेरे होते हुए तुम्हें गिरह-ए-अक्द-ओ-गैर से बांध दिया।तुम्हारे जिस्म,जेवर कि तारीफ़ अब नही करुगा क्योकि यह कहने का हक-ओ-हुकूमत सिर्फ तुम्हारे ख़ाविंद को है। मैं यह कहूंगा कि हसरत-ए-अत्फ़-ओ-ना तमाम में सिर्फ तुम्हें ही याद करूंगा,यह भी कहूंगा कि तकसीम-ओ-कुर्बत-ए-आलम मे तुम्हारा ज़िक्र करुगा यह भी जरूर कहूंगा कि इस जहां में तुम्हारा सबसे ज्यादा इंतजार इस मुन्तजिर ने किया। पर क्या फायदा रहा इस सब्र का, जो बाते रूबरू तुमसे कहनी थी, वो खत में लिख रहा हूं। मेरी मज़लूमियत तो देखो यह जानते हुए भी यह खत तुम तक कभी नहीं पहुंचेगा, ख़ुदा न ख़्वास्ता तुम्हे मिल भी गया तो तुम क्या समझ पाओगी फिर भी मैं इसे तरह सजा रहा हूं जैसे इत्र में महकाती तुम अपने बाल, या चिलमन मे सवारती अपनी टाल।

आइंदा इस मोहल्ले में कहां चहल रहेगी ?

आबादी मिलेगी,मीनार मिलेगी,पर सब बेजार मिलेगी।


  तुम्हारी मौजूदगी आतिश थी अब पत्थर से चुभेगे एक-एक पहर

निशान रह गये बस,बजंर बस्ती मिलेगी


   एक तुम्हारे ससुराल में तुम्हारी जान रहेगी

एक तुम्हारे पीहर में तुम्हारी याद रहेगी

एक मेरे आंगन में तुम्हारी कमी खलेगी


लाल गुलाबी हरे रोशनी से बिखरा आपका आंगन गीत-संगीत का शोरगुल रिश्तेदारों की आवाजाही यह सब कुछ मुझे पीर दे रहा है,मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा है क्यों मैंने ऐसा किया शायद मेरे जज्बातों में कुछ कमी थी,मैं आपकी इस्मत समझ नहीं पाया या शायद मेरे एहसासों में कमजोरी थी कि मैं तुम्हें खुद से जोड़ता रहा… पर मेरी कलम मेरी स्याही मेरे कागज यह सियाह वह कोकब वह महताब यह सब गवाह है कि जिस उम्मीद से आपको खुद से बांधा, वो रिश्ता पाक था।तुम्हारे लिए मेरी नियत साफ रही कल्ब​ में जो जगह दी खालिस रही,क्या हुआ जो तुम रस्म-ए-निस्बत में बंध गई,तुम मसर्रत-ए-अक्द़ में मुझे भूल गई,तुम किसी की संगिनी बन गई। मुझे गर्व है आज इस रिश्ते पर क्योकि इसमे कोइ फ़साद नही हैं। मैनें नाफ़ ही नही, तुम्हारे मन को भी साफ़-साफ़ देखा हैं।तुम्हारी मुरव्वत तुम्हारी रहमत तुम्हारी सीरत तुम्हारी मासूमियत तुम्हारी हया तुम्हारी बहार,मुझमें  तुम्हारी सुंगंध बिखेरेगी , जिस तरह मेहंदी  बिखेरती खूबसूरती तुम्हारे हाथों में। तुम्हारी मौजूदगी से मेरी जिंदगी में चहक है जश्न है त्यौहार है तीज है ईद है,पर अब आपकी सोहबत मेरी पहुँच से अजहद दूर हैं।किसी और के लिए हो ना हो पर मेरे लिये यह मिसाल-ए-मोहब्बत बनेगी और यह यकिन दिलाता हू कि वो रिश्ता जिसे मैंने मेरसिह तुम्हारी शक्ल दी है वो रिश्ता ताउम्र पाक रहेगा।
मेरा मिजाज बदल जाता मेरी नजरिया बदल जाता तुम कहां इतनी खूबसूरत दिखती, कहां तुम्हारी पायल मेरा ध्यान खैचती, कहां तुम्हारी सूरमांग मुझे तुम पर लिखने पर मजबूर करती?…अगर हम मिल जाते। तुम्हारी दूरी ही मुझसे तुम्हारी नजदीकी रहेगी क्योंकि साथ रहना कभी मजबूरी होता है तो दूर रहना मोहब्बत भी।हो सके तो मुझे माफ़ करना तुम्हारी बिना इजाज़त के तुम पर इतना सब कुछ लिखने के लिए,फिर भी मैंने तुम्हारा मान रखा है, तुम्हारा नाम जग जाहिर नहीं हुआ अब तक। और उन सभी लम्हों के लिए शुक्रिया जिनका जिक्र इस खत में हुआ,और कुछ जो अभी भी दफन है।
  आज सब कुछ पूरा हो गया कुछ भी निस़्फ़ नहीं रहा। हमारा ना मिलना ही मिलना है ।तुम जहां रहो आबाद रहो खुशहाल रहो दिलशाद रहो तंदुरुस्त रहो,किसी चीज की कमी ना हो कोई दिक्कत कोई तकलीफ़ तुम्हारे पास ज्यादा देर ना रुके।जब तक मसरूफ रहूंगा तब तक तो कुछ नहीं पर जब तुम्हारा कोई ख्याल आ जाएगा,तो तुम्हारी बेहद याद आयेगी…


तुम्हें तुम्हारी और मुझे मेरे नव जीवन की प्यार भरी शुभकामनाएं।


इस तरफ

जो अपने नाम से तुम्हे नहीं जोड़ पाया





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