Aisa kya kaha…

सुनना हमें बिल्कुल पसंद नहीं है और शायद यही कारण है कि अकेलापन इस महामारी से भी बड़ी समस्या है।

कहते हैं ना भक्त बिना तो भोले भंडारी भी अधूरे हैं उसी तरह शिष्य बिना तो गुरु भी अधूरे ही हैं।आज के परिपेक्ष में देखा जाए तो ना ऐसे शिष्य है और ना ही ऐसे गुरु,अगर आज के दौर में कोई शिष्य अपनी शादी वाले दिन गुरु से आशीर्वाद लेने जाए और गुरु,संत दादू जी की तरह ज्ञान दे तो शिष्य सीधा यही बोले “गुरु जी आप तो परणीजेडा हो, म्हारे सामै काई ज्ञान छांटो” और तो और गुरुजी से दुश्मनी और हो जाए भी की “गुरु जी, टोकता आ म्हने, बो टोकोणो कोनी हो,बो म्हारे ऊपर टोणो करता।” शिष्य और गुरु दोनो के मन मे संशय है, और ये स्वाभाविक भी है। शिष्य सिर्फ अपने कल्याण वश गुरु से जुड़ा है,वो वास्तव में कभी गुरु के प्रति समर्पित होता ही नही है,सामने जरूर इज्जत है पर पीठ पीछे उन्ही की खिल्ली उड़ती है। वास्तव में यह दोष सिर्फ शिष्यो का नहीं हमारी जीवन शैली का है… सुनना हमें बिल्कुल पसंद नहीं है और शायद यही कारण है कि अकेलापन इस महामारी से भी बड़ी समस्या है।शिष्य जहां अपना कर्तव्य भुल चुका है,वही गुरु अपना तेज खो चुका है। वासुदेव कृष्ण ने भी यही कहा है कि गुरु तो वो होता है जो किसी का भी मोह ना करें,जो अपने शिष्यों से मूल्य की नहीं दक्षिणा की उम्मीद करें,जो प्रतिस्पदा की नहीं खुद में श्रेष्ठ बनने की शिक्षा दें।देखा जाए तो आज गुरु बहुत ही कम है, बहुसंख्या तो शिक्षा देने वाले शिक्षको की है।
पर इसमें दोष ना शिष्यों का है और ना ही गुरुओं का,समय की मांग ही कुछ ऐसी है … आज शिक्षा नौकरी लगने के लिए ली जाती है और ज्ञान सिर्फ अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए दिया जाता है। गुरु और शिष्य का संबंध सिर्फ निजी स्वार्थ के कारण है,शिष्य को नाम कमाना होता है, और गुरु जी को अपना घर चलाना है।वास्तव में ये स्वार्थ ही तो है जिसने आज हर संबंध को संभाला हुआ है।
धन्य था वो समय जब संत गुरु दादू जी, गुरु बालकनाथ जी, गुरु जाम्भोजी आदि महान गुरुओ ने उस अलख को जगाया और रज्जब,मिस्किन दास,दरियावजी आदि शिष्यो ने उस ज्योत को आगे पहुँचाया। गुरु वास्तव में आषाढ़ पूर्णिमा के चंद्र के समान होते है… सम्पूर्ण ,शीतल,समकक्ष और शिष्य उस काले आसमान के भांति…संकुचित और सियाह मे।
रज्जब जी ने तो गज्जब करा, पर ये जानते हुए भी की जिंदगी में वैसा ही होता जैसा हम सोचते है, ये मन वैराग्य से डर जाता है। कितना कुछ लिखना है कितना कुछ प्राप्त करना है क्या पता हम से भी कभी कोई पूछ ही ले…ऐसा क्या कहा

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