हुआ कुछ यूह होगा रज्जब हाथ जोड़ सर झुका कर आर्शीवाद ले रहे होंगे।
” इस सहरे से आशीर्वाद लिया? इस लाल शेरवानी ने आशीर्वाद लिया? अपने हृदय में बसे प्रभु से आशीर्वाद लिया? ” दादू जी की बात सुन रज्जब हक्का बक्का रह गए। ” निर्गुण निराकार ब्रह्म ही चेतना है, वो ही सत्य है, वो ही फ़ज़ल औऱ फलाह है और तू… “दादू जी बारात की ओर इशारा करते हुए बोले।
“हे महात्मा, जब ब्रह्म हर तरफ,हर कण में है,तो वह ब्रह्म जो उस नवीन रिश्ते में मुझे मिलेगा,उसके प्रति ऐसे भाव क्यो? ” रज्जब ने अपनी बात रखी।
“विवाह उपरांत तुझे उस रिश्ते में ईस्वर की छाया तो अवश्य दिखेगी,परंतु अति शीघ्र तुझे वो बिम्ब एक अवतार लेती भी दिखेगा, लालसा,मोह,संघर्ष,प्रेम और क्रोध उस अवतार के कण होंगे। वो आकृति तुझे सुख और दुख दोनों ही प्रदान करेगी,परन्तु साथ ही तुझे भयभीत भी रखेगी, वो आकृति तुझे बांध के रखेगी जिसके कारण तू इस अखंड अनंत संसार को कभी देख ही नही पाएगा। आसमान से गिरने वाली बून्द कही तो धरा में कटवा ला देती है,तो कही धरा को उपजाऊ बना देती है,इला उन बूंदो को किस तरह स्वीकारती है सब कुछ उस पे निर्भर करता है ।निराकारी ब्रह्म तो विगत के कर्म ,वर्तमान के सत्य और भविष्य की चिंताओं से भी परे और परम है।“
मनीषी की बातों में रज्जब वो परम सत्य देख रहे थे तो शायद उनके आमेर पहुंचने पर गायब हो सकता था। वे और भी दादू वाणी ग्रहण करना चाहते थे, वे जानना चाहते थे शक्ति क्या है,संबंध क्या है,ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई,मृत्यु क्या है और उनके जन्म का औचित्य क्या है ? “महात्मा मुझे मार्ग दिखाए, मुझे उस ज्ञान से अलंकृत कर दे जिससे मुझे उस ब्रह्म की प्राप्ति हो।”
“निराकारी तो समर्पण,मुक्ति,अद्वैत और अनंत का नाम है,जो मोह और बंधन में रखे वो परब्रह्म नही।” दादू जी की बात सुनते ही रज्जब शेरवानी की घुंडी खोलने लगते है। रज्जब के ह्रदय में अब ऐसी ज्योत जगी थी जिसने उन्हें उनके जीवन के वास्तविक कर्तव्य का बोध करवा दिया।
” ये शेहरा ये शेरवानी साक्ष्य है कि तूने अपनी मनोस्थिति पर विजय पा ली।” इशारो इशारो में रज्जब समझ गए कि ये पोशाक ही थी जो मुझे आज यहाँ ले आयी है, इसे खुद से दूर क्यो जाने दिया जाए?
रज्जब ने बीस वर्ष की आयु में वैराग्य अपना लिया और कहते है फिर उन्होंने अपनी जगह अपने छोटे भाई को विवाह का प्रस्ताव दिया। बारात आगे चली गयी और वे एक लंबी यात्रा पर निकल चले।
ये भी एक कथा है की दादू जी ने अपना शरीर छोड़ा तो उसके बाद रज्जब ने फिर अपनी आंखें कभी नही खोली।
Aisa kya kaha…
सुनना हमें बिल्कुल पसंद नहीं है और शायद यही कारण है कि अकेलापन इस महामारी से भी बड़ी समस्या है।