कहते है हर एक चीज़ का अंत होता है.. प्रेम का, मोहब्बत का,नफरत का,जुनून का,जवानी का,सादगी का,दीवानगी का,मर्ज का,हिज़्र का। पर कुछ है जिसका कभी अंत नही होता …ज्ञान,शिक्षा,तालीम,तर्बियत।
बहुत से चीज़े ऐसी है जिसके बारे में हम जानते है, पर ऐसे बिंदु अनेक है जिनके बारे में हमने सुना तक नही।
ये इंसान की रुचि पर निर्भर करता है..वो किस क्षेत्र में ज्ञान अर्जित करना चाहता है। वो किस क्षेत्र में अपनी सोच का विकास करना चाहता है।
मेरी रुचि मुझे “धर्म” “संत” “सम्प्रदाय” की ओर खींच ले गयी, और मुझे ये ब्लॉग लिखने पर मुझे मजबूर कर दिया।
इंसान के जीवन में एक बहुत अहम और खास दिन होता ..उसका विवाह। कितनी खुशियां होती है कितनी उम्मीदे होती है। इस दिन एक नए जीवन की शुरुआत जो होती है…पर क्या हो जब विवाह से कुछ क्षण पूर्व ही एक ऐसी शख्सियत से हमारी भेंट हो जाये…जो हमारा विवाह से विश्वास उठा दे, हमे सारी मोह माया से ऊपर उठा दे, जो कुछ ऐसा ज्ञान दे कि पल भर में जीवन पलट दे। सुनने में बड़ा अजीब लगता है…पर ये कभी सच हुआ था।
ये बात है कवि रज्जब अली खां और महान संत दादू दयाल जी की। वैसे में इतिहास का शागिर्द तो नही हु,पर जितना पढ़ा उसके अनुसार बात है संवत् 1644 की।
अपने विवाह के उपलक्ष में रज्जब जी सहरा पहन कर,इत्र में महक कर, बन ठन कर आमेर की ओर अग्रसर थे। कहते है जब वे रास्ते मे थे तब उनकी नज़र संत कवि दादू जी पर पड़ी। वे बचपन से ही दादू जी के उपदेशों से प्रभावित थे,और चूंकि आज तो दिन भी इतना खास…रज्जब जी बारात रुकवाकर दादू जी का आशीर्वाद लेने गए। कई जगह लिखा है जब रज्जब गए तो दादू जी ध्यानस्थ थे,कुछ देर बाद उन्होंने रज्जब से बात करी, तो कही लिखा है जब रज्जब पहुँचे तो दादू जी अपने अनुयायियों को ज्ञान दे रहे थे,तो कही ये भी है कि दादू जी रज्जब को बारात के सामने ही मिल गए थे। खैर जो भी है रज्जब ने दादू जी से आशीर्वाद मांगा, तो उन्होने कुछ ऐसी बात रज्जब सी की वे रज्जब के ह्रदय में बस गई और उन्होंने निगाह का ख्याल त्याग दिया।
मुझे जिस चीज़ ने अपनी और खेचा वो है वो बात जो दादू जी ने रज्जब से की जिसके पीछे उन्होंने अपना निगाह क्या सारा जीवन छोड़ दिया। आज जहाँ हम अपने खून के रिस्तो की नही सुनते,कभी कभी तो खुद को भी अनसुना कर देते है,उस वक्त उनके लिए कितना मुश्किल या कितना आसान रहा होगा।आखिर ऐसा क्या कहा होगा दादू जी ने जिसके पीछे रज्जब ताउम्र कुँवारे रहे।
कही इस बात का हूबहू जिक्र नही है ,हम बस कल्पना कर सकते है,तो मैंने भी की….दादू जी ने आखिर ऐसा क्या कहा…
Aisa kya kaha…
सुनना हमें बिल्कुल पसंद नहीं है और शायद यही कारण है कि अकेलापन इस महामारी से भी बड़ी समस्या है।