जब जहाँ जैसा था तुम्हारा मिजाज
तब वहाँ वैसी ही रखी मैंने अपनी ताल
तुम्हे लगा ये मेरा शौक़ है
इसमे कहा शोहरत है
तुम्हे सब कुछ पता रहा...पर
शौक़ और हाजत में फ़र्क़ का इल्म नही।
तुम्हे ताल तो पसंद है पर
मेरी राग से एहतिजाज भी...
कुछ कम नही।
कैसे छोड़ दू ये ग म प
ये नि रे सा नि ही मुझ में।
हर सांस सरगम बने जा रही है
पर तुम्हे सलाहीयत की पहचान भी नही
ये मौसीक़ी मुझमें है
मुझमे मारवा राग है
इसके बिना क्या जश्न क्या विलाप है।
है ये मेरे हृदय के बोल
जो तुम्हारी जिंदगी की धुन से मिलते
ये बस लगते है भारी...
पर तुम बिन ये गीत भी नही।
बहुत जल्द मुदित ख्याति से भी मिलेगा
जानता हू तुम्हे संगीत तो पसंद है,
पर मेरे संगीत पर तुम्हे एतराज भी...
कुछ कम नही।
thanks for coming here 🙂