अब इस ख्याल ही ख्याल में मेरे ज़हन से सिर्फ एक ही चीज़ निकल रही है…
“बनते बनते दुल्हन प्रीत हमारी उलझन बन गई
मेरे दिल की धड़कन मेरी जान के दुश्मन बन गई
कुछ कह कह के कुछ रह रह के तड़पा रही है…
याद आ रही है तेरी याद आ रही है”
मुझे किसी की बेहद याद आ रही है पर तकलीफ सिर्फ इस बात की है मुझे खुद नही इल्म क्यो वो सुध आ रही है। और यह गीत गुनगुनाते हुए चिड़िया उड़ गई और पीछे उसका एक नन्हा परिंदा भी उड़ गया। ये बेजुबान अपनी ची-ची से मुझे नीड़ का महत्त्व बता गए, यह नीड़ ही है जो हमारी प्रथम सुरक्षा का दायित्व लेता है, बाहर कहीं कितना भी क्यों ना भटक ले ये नीड़ ही तो है जो अंत में हमें पनाह देता है, और ये नीड़ ही है जो सुकून ए रब्त हमसे रखता है।
एक उस भाग दौड़ में; जिसका अभी फिलहाल कोई महत्व नही है; हमने अपने आशियाने को मकान बना लिया,पर नीड़ बनाना भूल गए। मकान में सभी सुख सुविधाएं है,पर कोई वहाँ चहकता नही,सब कुछ होते हुए भी उदास हताश रहता है। व्यंजन आज़ादी हवा नीर सब कुछ है मकान और नीड़ में,मगर मकान में वो चहचहाट नही,अंदर ही अंदर अपने कमरे में अपने आप मे सब खोये है, ग़ुम है ,सब अलग है। मकान में कोई गीत नही गाता, वही नीड़ में… सब एक ही सुर में है,और जहाँ सुर मिलते है तराने भी वही से निकलते हैं।
बहुत दूर आ गया, ना तालीम ना तनख्वाह मिली
बहुत करीब आ गया, हर आंख खुद में गुम मिली
पर धीरे धीरे मैं साथ ला रहा हूं
बेजुबानो से जो सीखा ,अपना रहा हूं
मकान बन रह गया था
उसे अब नीड़ बना रहा हूं।
मुदित