नीड़ : जो बनाना है

चिड़िया कभी अपने नीड़ में आती है तो कभी फ़ुर्र हो जाती है,मैं खुद कैद में हूं तो इस पर गौर फरमा रहा हूं

नफा ए वबा

इस वबा मैं सबका किसी न किसी तरीके से बहुत नुकसान हुआ है पर मेरी नजर में एक ये नुकसान सामने आया की जब तलाक की तारीख वाले दिन ही लॉकडाउन  हो गया पर इस वबा से सिर्फ नुकसान नही हुआ नफा भी हुआ है। मेरी नज़र में एक ये नफा सामने आया कि ठीक लॉकडाउन से एक दिन पहले किसी की शादी का होना। सोच कर ही कितने परम प्रेम की अनुभूति होती है,और फिर भी लोगो से घर मे रहना मुश्किल हो रहा है। मेरा जी तो ये होच होच के अमूज़ रहा है की लोगो को पता नही है वो किसके के साथ कैद है। लोग ये तर्क देकर बाहर निकल रहे है कि “माय तो जी अमूज़े” अरे पितामह जो जी तुम्हारा अपने परिवार के साथ नही लग रहा, वो बाहर किसी के साथ किस तरह लग सकता है?

पर मुझे नसीब हुई है दूरी वह भी दुख भरे मतलबी और बेजार रिश्तो से। मैं चाह कर भी जिन्हें अपने घर पर आने से नहीं रोक सकता था वबा ने वह कर दिया… मुझे उन ज़ाहिरदार रिश्तो से पल भर के लिए ही सही पर दूर कर दिया। जिन रिश्तों पर नाज था उनका चेहरा दिख गया… हाथ में मोबाइल लिए कब से बैठा रहा पर भारत सरकार के मैसेज के अलावा किसी ने नहीं संभाला, इस वबा ने सच में बहुत दूरी ला दी।
जब जिंदगी वापस पहले सी हो तो जिस तरह ये वातावरण पवित्र हुआ है, उसी की भाँति लोगो का ह्रदय भी पवित्र मिले।
पर ये पावन वातावरण बहुत कुछ खोकर हासिल हुआ है यह महामारी तो बीत ही जाएगी,पर ये बहुत गंभीर संदेश हमें देकर जाएगी। वास्तव में जब प्रकृति अपने उग्र रूप में आती है तो ना तोप काम आती है और ना ही परमाणु ताकत, काम आता है सिर्फ संयम। ये वबा मानव को मानवता सीखा कर जाएगी।ना सिर्फ इंसान को इंसान से बल्कि इंसान को हर चीज से प्रेम करना सिखा कर जाएगी जो उसकी जिंदगी से जुड़ी है या नहीं जुड़ी| यह वबा हमे हर किसी की अहमियत  सिखा कर जाएगी।


एक नफा ये भी हुआ है कि हम आत्म निर्भर हो गए…चाहे इन्वर्टर में पानी डालना हो,या दो माह से बंद खड़ी गाड़ी को चालू करना हो,चाहे घर की सफाई करनी हो, या बहते हुए नल की मरम्मत, आज कल हमे किसी की जरूरत नही, ये छोटे मोटे काम तो हम किसी विदेशी फ़िल्म के कलाकारों की भांति अपने आप करने लगे है। अब जब आत्म निर्भर हो गए है तो संयम भी प्राप्त हुआ है…कहाँ पहले रोज दर्शन के लिए दिल हुँच हुँच करता था,पर अब भी तो जी रहे है।

“हे पार्थ… जो स्वयं के भीतर ही है, ह्रदय में है उससे मिलने के लिए रोज गुरुद्वारे,मंदिर या ट्यूशन क्लास जाना आवश्यक नही “

सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि हम हर चिंता से मुक्त हो गए… पहले चिंता रहती थी तबीयत की, सरकारी नौकर बनने की,कमा कर खाने की, रोज तारीफ ए पुल बाँधने की, रात में जल्दी सोने की, तकलीफ होती थी घंटी बजने पर दरवाजा खोलने की, मेहमान के लिए  चाय बनाने की, और भय रहता था लंबे ट्रैफिक जाम में फंसने का,लेट ऑफिस पहुंचने का रात में मोबाइल चलाते पकड़े जाने का और अब… ना तो कोई फिक्र है ना कोई डर ना चिंता ना ही कोई तकलीफ जो कुछ है बस इतना या तो जियेंगे या फिर मर जाएंगे। वास्तव में देखा जाए तो आज के समय में जीना बहुत मुश्किल हो गया है और मरना बहुत आसान| लोग हमेशा ये ही कहते हैं कि हम तुम्हारे लिए अपने प्राण भी त्याग सकते हैं पर कोई यह क्यों नहीं कहता कि हम अपने प्राण त्यागने के बाद भी  तुम्हें अपनी आत्मा में हमेशा जीवित रखेगे|
कुछ एक अविकसित दिमाग को को छोड़ दें तो हर दिल में आज सिर्फ एक ही इरादा है कि किसी तरह अपनी और मानवता की सांस बरकरार रखनी है। सच में मैं खुद भूल सा गया था कि कितनी जिम्मेदारी थी कितनी बारीकी थी कितनी भागदौड़ थी जिंदगी में और अब ऐसे फ़ारिग हु जैसे कि वो सब परेशानियां वापस आएगी ही नहीं। अब तो सोच कर ही डर लगता है फिर उन सबको कैसे झेलूंगा ? पर कभी तो लॉकडाउन को भी हटना होगा, फिर एक लंबे जाम में फंसना होगा,सुबह जल्दी उठ भागना होगा, सरकारी परीक्षा पास करनी होगी,  और जिन्हें पसंद तक नही करते उनकी आवभगत करनी होगी।

कितने काम थे जिंदगी में सब रुक गए घर किराए पर चढ़ाना था, पुरानी नौकरी से इस्तीफा देना था, एक नया सुर सीखना था, एक बड़ा इम्तिहान देना था एक बड़ा तलाक लेना था एक नया ब्याह रचाना था,एक महंगा जेवर खरीदना था,एक दिल कहीं से कहीं तब्दील करना था,एक बोझ दिल से उतारना था। क्या कुछ काम नहीं था हमारे पास पर मेरी सच्चाई यह है कि मेरे पास इतना फिजूल ए वक्त है कि एक चिड़िया को उसके बच्चों को दाना खिलाते तस्वीर खैचने के लिए मैने करीब अपने बीस मिनट  गंवा दिए। जहां हम लोग बीते कई दिनों से घर में कैद हैं वही चिड़िया कभी अपने नीड़ में आती है तो कभी फ़ुर्र हो जाती है| आज नहीं तो क्या हुआ कभी हम भी तो ऐसे ही जिंदगी जीते थे… दो पल नीड़ में आते और फिर गायब। इस चिड़िया को डर नहीं है और शायद इसे ये पता भी नहीं कि ये वबा क्या है। यह तो हमेशा से ही आज़ाद थी। आज मैं खुद कैद में हूं  तो इस पर गौर फरमा रहा हूं। हमारे आस पास कई इंसान भी ऐसे होते हैं जिन पर हमारा ख्याल कभी नही जाता पर उनकी गैरमौजूदगी अक्सर उनका ही ख्याल दिलाती है।


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