मै उन सूखे हुए होठ से दास्तान ए वबा सुं ही रहा था कि एक आवाज़ अंदर आंगन से आयी, और वो रात्रि की नींद की तरह मुझसे दूर चली गई।अब सिर्फ एक धुन जो सुनाई दे रही थी वो थी,मेरे समीप ही एक नीड़ से आती हुई, कितने आश्चर्य की बात है जहां सारी दुनिया खामोश हताश बेजान बैठी है,वहीं ये चिडा-चिडी और उनके बच्चे इतनी जोर से शोर मचा रहे है। क्या इन्हे मालूम नहीं बाहर मंजर ए मौत है। मैं दरवाजे पर लगी जाली से उस नीड़ की ओर देखने लगा। एक टक आंख लगाए मैं वही देखे जा रहा था।और देखते ही देखते उस नीड़ ने मुझे अपने अंदर खींच लिया और मुझे ये लिखने पर मजबूर कर दिया…
कुछ दिन पहले तक हम कितने मशरूफ थे क्या कुछ नहीं सोचा था जिंदगी के लिए … पर अब जिंदगी ही नहीं बच रही। कुछ दिन पहले तक कितनी उम्मीदें थी…यह होगा वह होगा पर अब सिर्फ एक ही उम्मीद है किसी तरह यह वबा खत्म हो ही जाए। पहले हर एक दिन का हिसाब रहता था,क्या करा, आगे क्या करना…पर अब सिर्फ कयास लगा बैठे है कि जल्द इससे निजात मिल जाये। कुछ दिन पहले तक इंतजार था… कभी तो छुट्टी मिले इस भाग दौड़ से… पर अब ये फुरसत के रात दिन ही चुभ रहे है।
हाल हमे छेड़ देता जोश ए इश्क़ से
मुदित
किस तरह गुज़रेगा…
मुस्तक़बिल ए खदशा कल्ब मे लिए हुए