“अरे बेटा,उठ जा पांच बज गए है” जैसे ही ये ध्वनि मेरे कान में पड़ी मेरी आंखे एकाएक खुल गई। पांच बज गए ? बीती रात दादी ने कहा था, कल सुबह मेरे साथ माता जी की मंदिर जाएगी, आज नवरात्र का पहला दिन जो है। मंदिर के पट सुबह साढ़े पांच बजे खुलते है,और दादी के साथ भगवान के मामले में देरी करना मतलब…अब मेरे पास समय बहुत कम था। मै जल्द से जल्द घिरता पड़ता नीचे तैयार होकर पहुंचा..दादी मुझे बड़ी खारी नजरो से देख रही थी पर बोलीं कुछ भी नहीं। घर से बाहर निकला तो गजब का नज़ारा था…टिमटिमाते तारे,काला आसमान, ठंडी हवा, एक अलग ही नशा था उस हवा में…सुकून भरा..
गाड़ी में बैठा दादी को मै जल्द से जल्द मंदिर ले गया। मंदिर तक पहुंचे तो पाया कि मंदिर के द्वार अभी तक नहीं खुले है..कतार लग चुकी थी और कतार भी पुरषों की लंबी थी..वाह माता रानी! हम भी लंबी कतार में लग गए, करीब पांच पैंतीस पर मदिर के पट खुले, और श्रद्धालुअंदर जाने लगी।
मैने कभी नहीं सोचा था कि इस पट में प्रवेश करने के बाद जिंदगी सिर्फ इस पट के भीतर ही रह जाएगी। “बोलो, ब्राह्मणी मात की …” एक जोर के जयकारे के साथ मै मंदिर के भीतर घुसा। मैंने नहीं सोचा था..अगले नो दिन..मेरी जिंदगी पलट देंगे।
प्रसाद
मंदिर में पुरषों की कतार लंबी थी,पर तेज गति से आगे बढ़ रही थी, दादी महिलाओं की कतार में पीछे थी, हौले हौले ..मै माता की मूरत के समकक्ष पहुंचा..सिर पर चमकीला मुकुट,लाल वस्त्र,इलायची की माला..बहुत सुंदर श्रृंगार..

हाथ जोड़ कर अरदास लगा रहा था कि .. एक टिल्ला बाई और से और एक धक्का पीछे से मिला, और मै कतार से बाहर..अब आज दिन ही कुछ ऐसा है, माता के दर्शन तो हो गए ना बाकी माता को पता है मेरे बारे में..सोच सोच में परिक्रमा लगा मै एक कोने में दादी कि प्रतीक्षा में खड़ा हो गया। “देना हो तो दीजिए..जन्म जन्म का साथ,मेरे सिर पर रख दो माता…..” मन ही मन मै भजन गुनगुना रहा था और तभी एक हाथ मेरी ओर आया..एक महिला का हाथ..हाथ में प्रसाद था..”जय माता की” कहते हुए उस महिला ने मुझे वो प्रसाद देना चाहा, उस महिला सफेद रंग का सूट पहना हुआ था, चुन्नी से सिर ढ़का हुआ था, ताज्जुब के बात ये कि वो कद में मुझसे भी लंबी थीं। अब मै भोला भाला प्राणी…मुझे तो ये प्रसाद ग्रहण करना ही था। “जय मां” और मैंने प्रसाद ग्रहण करा। और मुझे प्रसाद दे, वो महिला भीड़ में कहीं ओझल हो गई। मै वहीं खड़ा मीठे प्रेम का स्वाद चख रहा था, की दादी दर्शन कर आ गई। और हम मंदिर से बाहर आ गए,मैंने आस पास नज़रे दौडा के उस महिला को खोजना चाहा,पर वो नहीं दिखी। मै और दादी भोर में माता के दर्शन कर वापस घर की और लौट चले।
घर पहुँचते पहुँचते सूर्य देवता की ज्योति फैलनी शुरू हो गयी थी। वातावरण ठंढा था, और अब मुझे अपना बिस्तर और बिस्तर पर रखी चद्दर अपनी ओर खीच रही थी। और ये सुबह सुबह की नींद ..मैं वारी जाऊ।
आँख खुली तो मोबाइल में लगी अलार्म बज रही थी…अब देर होनी शुरू हो चुकी थी। मैं जल्द तैयार हो काम पर निकल पड़ा। ऐसे तो माता रानी के दर्शन सुबह कर लिए थे..पर एक अनजानी ताकत ने मुझे फिर मंदिर के मार्ग की और खीच लिया।और कुछ ही देर में मैं फिर मंदिर में खड़ा था, पर अब सुबह की तरह भीड़ बिल्कुल नही थी, कुछ ही लोग थे। मैं माता के सामने सुबह अधूरी रही अरदास पूरी कर रहा था कि अचानक पीछे से किसी ने मेरा पैर खीचा,पलट के देखा तो कोई नही था,पर जब नज़रे तोड़ी नीचे गयी तो पाया…वोही सुबह प्रसाद वाली महिला। “नीचे बैठ जाओ” उस महिला ने मुस्कराते हुए मुझसे कहा,उसने अभी भी चुन्नी से सिर ढका हुआ था। हो सकता है मै बीच मे खड़ा था,तो शायद उन्होंने मुझे किनारे होने का कहा हो,मैं किनारे भी खड़ा हो सकता था, पर मैं वही बैठ गया। आज का दिन तो कमाल का ही जा रहा है…माता रानी मैं ये क्या कर रहे हो आप अपने दरबार मे मेरे साथ। मैं अंदर ही अंदर बड़ा प्रसन्न हो रहा था। “मुदित” और अचानक उस महिला ने मेरा नाम मेरे समीप आ मेरे कान में कहा। पलट कर देखा तो वो कुटिल मुस्कान मुस्करा रही थी।
“तुम्हे मेरा नाम कैसे मालूम” मैने सहजतापूर्वक पूछा।
“तुम्हारे दीवानेपन पर पागल हूं मैं….” मेरे पैरों तले जमी खिसक गयी। उस महिला की उस मुस्कराहट मुझे अब भयभीत कर रही थी और मुझे मसहूस होने लगा कि जो प्रसाद मुझे सुबह दिया गया था..वो प्रसाद नही कुछ और ही था। मैं खड़ा हो परिक्रमा लगा आया..तो भी वो महिला वही बैठे बैठे मुस्करा रही थी। मेरे शरीर का रोम रोम मुझे वहाँ से दूर जाने के लिए कह रहा था..पर ना जाने उस प्रसाद में क्या मिलाया गया था.की मैं फिर उस महिला के पास जाकर बैठ गया।
“रोज नो दिन आना यहाँ” उस महिला ने मुझे फिर एक प्रसाद देते हुए कहा। मैं कुछ सोच समझ नही पा रहा था,शायद यही कारण था कि मैंने फिर वो प्रसाद ग्रहण कर लिया। मेरे प्रसाद लेते ही उस महिला ने गर्दन घुमा कर पीछे देखा, मैंने भी उत्साह में गर्दन उसी दिशा में घुमाई, और पाया वहाँ एक खिड़की से तेज प्रकाश आ रहा है, पहले तो ये खिड़की यहाँ नही थी,अचानक यहाँ कैसे….भय से मेरा दिल कांप रहा था, और फिर अचानक वो महिला मेरी ओर देख कर बडी जोर से हँसी…औऱ फिर..आँख खुल गयी।
मेरा दिल बड़ी जोर से कांप रहा था, पसीने से लथ पथ घड़ी की ओर देखा तो आठ बज रहे थे। ये किस तरह का सपना था? अच्छा है ये सिर्फ एक सपना ही था।
पूरे दिन रुक रुक कर मुझे वो सपना याद आ रहा था, आंखों के सामने वो महिला, उसकी हंसी , मेरे भीतर आंतक फैला रही थी।हर सपने का एक अर्थ होता है,पर इस सपने का क्या मतलब हो सकता है? क्यो आया ये ऐसा सपना मुझे ? क्या था उस प्रसाद में.. कही मैं कुछ ज्यादा तो नही सोच रहा ? अब इन सबका जवाब तो अगले दिन ही लगेगा।