Par Dekho naa…

ये सफ़ीना रस्म ए निसबत की दास्तान बताएगी

एक सफ़र की है बात
स्याही से लिख,हर पन्ना
तुमपे मैने ख़र्च करा
हर पन्ने पर लिख
तुम्हारा नाम,तुम्हे महसूस करा
पर देखो ना तुम खुद ही…
तुमने किसके लिए ये उपवास रखा।




मेरे रंग में जब तुम दिखी
खुद पर मैने फख्र करा
मेरे रंग में जब तुम नही दिखी
तुमसे ना मैने कोई फर्क रखा,
तुम्हे देखा मैने पहले
अक्षय तृतीया का चाँद किनारे रखा
चाँद छुप जाने के बाद तक
तुम वही खड़ी बतियाती रही
ये संशय तुमने क्यो मुझे दिया
पर देखो ना चाँद उसे…
उसने किसके लिए व्रत रखा।

जब तक थी तुम भूखी प्यासी
मैने भी अन्न नही छुआ
रीझ थी ये मेरे दिल की
तुम्हारी आवाज़ तुम्हारी चाल
खीच  लेती थी मेरा दिल
तुम्हारे पिले-नीले रंग वाली कमीज़
मुझसे दूर भी दिलशाद रही
हाथो में हिना निखरी रही
पर देखो ना दिल उसे …
उसने तीज का व्रत किसके लिए रखा।

है जरूर ये पागलपन
मुझे तुम्हारी आदत लगी
और तुम्हे तुम्हारी निसबत दिखी

है सफीना ये मेरे बहुत खास
भूलना चाहा जिसे जीवन से
आज वो एक नज़्म बन गई
पर देखो ना नज़्म उसे …
उसने किस अजनबी के लिए उपवास रखा।

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