Mera Saawan hai

ये एक नशा है शिव में मग्न होने का

शिवमय सावन

सावन…सावन नाम  सुनते ही आंखों के सामने एक दृश्य छा जाता है.. काले काले बादल, ठण्डी ठण्डी हवा,बादल की गर्जना,छोटी छोटी बारिश की बूंदे,गर्म गर्म समोसे,अदरक वाली चाय….हाए 🌧️
एक दृश्य ये भी आता है:- हर तरफ जमा हुआ पानी, पैरो में हवाई चप्पल, पानी मे हमारी बंद खड़ी स्कूटी और कुछ अज्ञात वस्तुओ का पानी के भीतर से हमारे पैरो को छू कर निकलना…खैर दूसरे वाले दृश्य में हकीकत तो है पर हम अपना ध्यान पहले वाले दृश्य में लगाएगे।
सावन सिर्फ एक महीना नही है जिसमे बारिश हो,हरियाली हो,झूलो पर आनंद हो, यह एक रास्ता है..खुद को ढूंढने का, यह एक भावना है खुद को समझने की और “ये एक नशा है शिव में मग्न होने का”। सावन वो एक खास माह है जो मुझे बेहद पसंद है सिर्फ इसलिए नही क्योकि
” सावन का महीना पवन करे सोर..
पवन करे शोर
अरे बाबा शोर नहीं सोर”
बल्कि इसलिए भी क्योकि इस माह में शिव बनने का मकसद मिलता है, और इसी माह में तो शिव के प्रेम में भिगने का अवसर मिलता है।
यूह तो मैंने बहुत कुछ लिखा है,पर आज मैं ऐसा कुछ लिख रहा हूं जो मैंने पहले कभी नही लिखा इसलिए ये ब्लॉग मेरे बहुत करीब है।
ललाट पर चंदन, हाथ और गले मे रुद्राक्ष की माला,बाजुओ पर भस्म,कानो में सुंगंधित रुई और लहराते हुए घने बाल के साथ जब हम किसी से रूबरू हो और सामने से जब कोई मंच-ऑन नचोस या पैन कॉन तोमते या कचोरी की मनुवार करे,खाने की इच्छा को दबाते हुए और फिर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ कहना “मेरा सावन है” कमाल की अनुभूति करवाता है।
वैसे तो मैं आधुनिक जमाने का हूं काफी अधर्म पाप और गलत काम भी किए है,पर सावन माह में मैं पूर्ण रूप से शिव की शरण मे चला जाता हूँ। इस माह में शिव की पूजा करते है, उन्हें खुश करते है , व्रत रखते है, नाखून और बाल नही काटते। सुनने में बड़ा अजीब लगता है,लड़का होकर ये पूजा ये अराधना ये आरती ये व्रत,पर सुनने में ये भी आया है कि आजकल इस किस्म के मुंडो का काफी तकाजा है।

सोमवार का दिन

सावन के सोमवार का दिन किसी आम दिन की ही तरह शुरू हुआ,वो ही चिड़ियों की चहचहाट,वो ही रोजाना की खबरे,वो ही परिवार वालो के ताने और एक प्यारी सी चाय। हाँ जी चाय!! चाय के बारे में सोचना विचारना तो था ही नही,चाय को तो दौड़ना था जी व्रत में। और चाय के साथ मुश्किले शुरू हो गयी..व्रत में क्या खाएं और क्या नही। मुझे हर एक कदम पर डर लग रहा था कि कही मैं ऐसा कुछ ना खा लू जिससे व्रत टूट जाये। तैयार होकर,पूजा कर के उठा तो दस बज रहे थे और अब समय था काम काज का। शिव भक्त बन मैं ऑफिस निकल पड़ा। सब लोग मुझे रुक रुक के देख रहे थे,ना जाने वो मुझमे ऐसा क्या देख रहे थे।पर शिव के श्रृंगार से आत्मविश्वास बहुत मिल रहा था।काम करते करते कब दो बज गए पता ही नही चला और वक्त था लंच का..पर आज कौन सा लंच? घर से लगातार आते फोन और साथ वालो के आग्रह पर एक गिलास ज्यूस पिया।शाम के छे बजते बजते, जी घबराने लग गया।सुबह से कुछ खाया नही था,घर आकर ध्यान भटकाने की कोशिश की; कभी मोबाइल कभी टी.वी  पर स्तिथि अब बिगड़ रही थी। शाम की आरती कर मंदिर से निकला तो सवा नौ हो रहे थे,और घर वाले थाली परोसे मेरा इंतज़ार कर रहे थे। पर अब तो सिर्फ कुछ ही समय रहा था, और मैं ये व्रत “तोड़ना” नही चाहता। घर वालो से मिलती गालियो के बीच मैने व्रत बारह बजे के बाद खोलने का निर्णय लिया। “शिव ये तोड़ी कहते है कि भूखे रहो, ऐसे तो कोइ भगवान खुश नहीं होंगे, डॉक्टर के पास ले जाने शिव नही आएंगे” और ना जाने क्या क्या घर वाले ताने मार रहे थे मुझे और मैं तानो के साथ चक्कर भी महसूस कर रहा था।अब शायद एक ही ताकत थी जो मुझे इन सब से उभार सकती है ..तप।
मैं भी तप करने बैठ गया,बैठा मैं सीधा था पर ऐसा लग रहा था मैं कभी इधर जा रहा हूं तो कभी उधर। मन का तो पूछो ही मत। एक तरफ ध्यान बाहर बज रहे पंजाबी गानों में जाता तो दूसरी तरफ ध्यान जाता अगर शिव  प्रसन हो गए तो कोनसे तीन वरदान मांगू। और फिर एकाएक ध्यान प्रियतमा पर। आंखे अंधरे में थी सितारे दिख रहे थे,जिनमे चमक बिल्कुल नही और फिर ज्योति दिखती,शिव जी मुझे सामने दिखते और पल भर में गायब, ध्यान वापस तप में ..ये सिलसिला चलता रहा।

pic from https://www.fizdi.com/god-the-shiv-art_2913_20436-handpainted-art-painting-9in-x-12in/


पास रखे मोबाइल में जब अलार्म बजी तो तप कर आंखे खोली..बारह बज गए थे,व्रत पूरा हुआ।
पर मैं वहाँ से तत्काल नही उठा…मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि वो घबराहट वो चक्कर आखिर कहा गायब हो गए ? आखिर मैने ये व्रत करा क्यो ?
शिव को प्रसन करने के लिए ? देखा देखी में ?
मैंने व्रत करा खुद पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए,इन्द्रियों को नियंत्रित करने के लिए।आज मेरे पास मेरे सामने खाने को सब कुछ था,पर मैंने कुछ नही खाया।मैं उन लोगो मे से नही जो चिप्स,फलहारी,फल,रबड़ी,मूंगफली,सामक  इत्यादि इत्यादि खाकर “अल्पहार” लेते है और बाद में दाल, भरवा भिंडी,अचार,खीर इत्यादि इत्यादि खाकर अपना व्रत खोलते है।
व्रत का अर्थ होता है सिर्फ एक प्रकार का आहार लेना,तप करना, खुद पर काबू पाना, शरीर की सफाई करना। जिस प्रकार दीवाली की सफाई में हम कमरे का सारा सामान बाहर निकाल देते है,किसी को उस कमरे में घुसने नही देते ,चीजे जगह पर रखते है,हमारा शरीर भी उस कमरे की तरह ही तो है। साल भर गंदा होता रहता है, और एक दिन व्रत रख कर,भूखे रह कर,एक अदृश्य ताकत को याद कर हम शरीर की गंदगी को साफ करते है,शरीर मे पुरानी कोशिकाएं खत्म होता है और नई कोशिकाए जन्म लेती है।शरीर फिर से तप कर साफ और व्यवस्थित होता है।मैंने ये व्रत तप की ताकत समझने के लिए करा,मैने ये व्रत खुद की परीक्षा लेने के लिए किया, बीमारी के बहाने तो हम भूखे रहते ही है,पर क्या किसी और बहाने से हम एक दिन भूखे रह सकते है? मैंने इस उत्तर के लिए व्रत रखा।इस बात में दोहराए नही की मैंने वैसी कोई पूजा या तप नही किया जिससे भगवान प्रसन हो,मुझे आशीर्वाद दे ,मेरा ध्यान भी बार बार भटक रहा था,पर मुझे खुशी है मैंने वो करा जो किसी और ने नही किया। मैने वास्तविक व्रत को समझा, दिखावा नही किया,खुद पर नियंत्रण कैसे करे ये समझा, भूखा रह शरीर को स्वस्थ करा,अपने आप को मजबूत बनाया। और भगवान भी तो यही कहते है मैं स्वच्छ और स्वस्थ  शरीर मे वास करता हूं; तो  क्या मैंने अनजाने में भगवान को खुश कर दिया? कही मैंने भोले भंडारी को खुद में तो नही बैठा लिया? कही मैने अपने किये पाप तो नही धो लिए?

मैने कहा था..मैं कुछ ऐसा लिख रहा हूं जो मैंने आज तक नही लिखा।पता नही मैंने जो सोचा वो सही है या गलत,मैने जो करा वो कही गलत तो नही।”इस व्रत में एक पागलपन था, एक नशा था”, मैने जरूर इस व्रत में गालिया सुनी पर इसी व्रत से किसी को मुदित होने की वजह मिली। रात बारह चालीस पर मैं अब खाना खाने बैठा…ये व्रत तो पूरा हुआ, अब अगले सोमवार कैसा व्रत रखु…मौन या फिर ऐसा व्रत जिसमे मैं मोबाइल कंप्यूटर से पूरी तरह दूर रह सकू या फिर ऐसा व्रत जिसमे अपनी प्रियतमा पर कुछ ना लिखू?
पता नही सोचेगे,पर मैं ये जरूर अब हर किसी से गर्व से कह सकता हु…… “मेरा सावन है” ।

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